Saturday, September 7, 2013

अमल

    
                                   अमल
 हमारे देश में सुनने वाले करोडो
सुंनाने वाले लाखो है
समझने वाले हजारो है 
 अमल वाले गिनती मे है

Thursday, September 5, 2013

उपदेश

        उपदेश


हमारे देश मे उपदेश देने वाले यदि एक लाख लोग है
तो एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकालने वाले
एक लाख एक लोग है क्योंकि उनमे वह भी शामिल है
जो खुद उपदेश देता है परन्तु उस पर अमल नहीं करता

उमेश गुप्ता का व्यंग्य : अफसर के रिटायरमेंट का दर्द

उमेश गुप्ता का व्यंग्य : अफसर के रिटायरमेंट का दर्द

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                                                 अफसर के रिटायरमेंट के जैसा दूसरा दर्द दुनिया में कोई नहीं है। इस दर्द की तुलना उस मंत्री के गम से भी नहीं कर सकते हैं जो सत्‍ता में होते हुए, सब सरकारी साजो-सामान के बावजूद भी चुनाव हार जाता है और ‘घर का न घाट का‘ की कहावत को चरितार्थ करता है। अगर इस दर्द का स्‍वाद लेना है तो किसी रिटायर्ड अफसर से उसका नाम पूछिये। वह सेवानिवृत्‍त अधिकारी बतायेगा और इस सेवानिवृत्त शब्‍द के साथ इतना दर्द उलट देगा कि आप इसके रिटायरमेंट के दुख से अवश्‍य परिचित हो जायेंगे।


रिटायरमेंट के नाम से ही अफसरों को बेहोशी आने लगती है। उनके सुकोमल पांवों में, जिन्‍होंने कभी धरती माता के कदम न चूमे हों, और सारी नौकरी जीप में बैठे-बैठे गुजार दी हो, कपकंपी छूट जाती है। सारी जिन्‍दगी वातानुकूल कमरे में गुजारने के बाद बाहर की भीषण गर्मी, कठोर ठंड , तेज बरसात की कल्‍पना करते ही उनके सुकोमल शरीर में सिरहन दौड़ जाती है। चपरासी द्वारा घर का काम करना, राशन लाना, मिट्‌टी के तेल की लाइन में लगना, गैस लाना, बिजली, पानी, टेलीफोन के बिल जमा करना, मेमसाहब के कपड़े व बर्तन साफ करना, बाबा को स्‍कूल छोड़ना , घर लाना आदि दुर्गम कार्यो के करने के दुःस्‍वप्‍न के नाम से भी नींद खराब हो जाती है।


रिटायरमेंट के बाद रुआब कम हो जाता है, मिलने वाले नमस्‍ते की संख्‍या कम हो जाती है। पहले जहां हाथ नमस्‍ते करने के कारण थक जाते थे, अब वही हाथ अपनी पुरानी आदतानुसार कदम-कदम पर नमस्‍ते न करने के कारण थक जाते हैं। मार्केट वैल्‍यू घटकर दस प्रतिशत रह जाती है। अगर अफसर समाजवादी, शिष्‍टाचारी, जमाने के साथ चलने वाला रहा है, तो समझ लो उसकी रिटायरमेंट के बाद बिलकुल भी पूछ नहीं होने वाली है। ऐसे अफसरों को रिटायरमेंट के बाद वे लोग ही सबसे ज्‍यादा दुख पहुंचाते हैं जो कभी उनके सामने जी हुजूरी करके अपना काम निकलवाते थे। वे लोग ही उसे सरे आम ‘बहुत बड़ा घूसखोर‘ का सर्टिफिकेट देने से नहीं चूकते हैं, भले ही वह असर स्‍विस बैंक धारियों की तरह बहुत बड़ा न हो, लेकिन फिर भी उसे बढ़ाचढ़ाकर बताना ये लोग अपना परम धर्म समझते हैं। उनकी महिमा में ये लोग एक से बढ़कर एक श्‍लोक मंडित करते हैं। ये लोग कहते हैं कि ‘बहुत अड़ियल साहब है, बिना लिये दिये कलम ही नहीं उठाता था, पहले पैसे की बात करता था, बाद में काम करता था।‘ अगर वह रिटायरमेंट के बाद आराम करता है तो लोग कहेंगे कि खूब कमाया है, अब बुढ़ापे में ऐश नहीं करेगा, तो क्‍या करेगा। अगर वह प्रतिभा का सदुपयोग करके कुछ काम करेगा, तो लोग कहेंगे कि ‘नौकरी में तो खूब कमाया, क्‍या उससे भी पेट नहीं भरा, अब क्‍या ताजमहल बनाने का विचार है, जो आराम के समय काम कर रहा है।‘ इस प्रकार के तीखे , जहरीले व्‍यंग्‍य बाणों से कदम-कदम पर रिटायरमेंट के बाद भेदा जाता है

रिटायरमेंट के बाद एक से बढ़कर एक गिरगिटान की तरह रंग बदलते लोगों का सामना करना पड़ता है । रिटायरमेंट के पहले ऐंठू गैस वाला, अकड़ू राशन वाला, घर सामान भिजवा दिया करता था। धोबी बिना चाय पिलाये जाने नहीं देता था। दर्जी ठंडा -गरम पूछे बिना आने नहीं देता था। नाऊ भरी दुकान साहब के नाम से छोड़कर घर चला आता था। सब रिटायरमेंट के बाद अपना-अपना असली रूप दिखाने लग जाते हैं। अफसरी की बची-खुची सारी हवा तो उस समय निकल जाती है, जब सामने से मुंह दबाता आता पुराना चपरासी नमस्‍ते करना तो दूर एक नजर देखना भी गंवारा नहीं समझता है और पीछे से आने वाले चपरासी से कहता है ‘जरा संभल कर जाना, पुराने साहब आ रहे हैं, सठिया गये हैं, कहीं कोई काम वगैरह न बता दें‘ इस प्रकार अधीनस्‍थ कर्मचारी तो उन्‍हें पहचानने से इन्‍कार कर देते हैं। साथ ही साथ उनकी जगह आया नया अफसर भी उन्‍हें कुछ नहीं समझता हैं वह उनके साथ वैसे ही रूखा-सूखा व्‍यवहार करता है, जैसा पहले कभी वे आम जनता से किया करते थे। उन्‍हें भी उस आफिस में काम करवाने में उतनी ही दिक्‍कत का सामना करना पड़ता है, जितना पहले कभी उनके जमाने में दूसरों को करना पड़ता था।

रिटायरमेंट के बाद समाज में पूछ तो कम हो ही जाती है साथ ही घर पर बेशुमार निमंत्रण कार्ड, आमंत्रण पत्र , डायरियां , कलेंडर भी आना बंद हो जाते है। डिनर और पार्टियां सपनों की बात हो जाती है। घर पर काम करवाने वालों का मेला लगना बंद हो जाता है। रोज-रोज बनने वाले नये-नये रिश्‍तेदारों का मिलना भी बंद हो जाता है। पहले जरा सा काम निकलवाने सात पीढ़ियों की रिश्‍तेदारी निकल जाना आम बात थी। अब साहबी जाने के बाद जब सगे संबंधी ही आंखें फेर लेते हैं, तब इन झूठे काम निकलवाऊ रिश्‍तेदारों की बात करना बेकार हैं।


रिटायरमेंट के बाद जब-तब घन जैसे आघात वृद्ध काया पर पड़ते रहते हैं। आमदनी कम, पेंशन से जब घर का गुजारा चलाना पड़ता है तब मेज के नीचे से आने वाले ‘पुत्रम पुष्‍पम‘ की याद आती है। तब समझ में आता है कि ऊपरी कमाई से कितने आराम से घर चल जाता था, गेंहूं, दाल, चावल के दामों का तो कुछ पता ही नहीं चलता था, पानी बिजली, फोन के बिल तो ऐसे ही जमा हो जाया करते थे। रिटायरमेंट के बाद ही सही तरीके से महंगाई की आग और ‘सरकारी टैक्‍सों के कोहरे‘ का पता चलता है। घर जो सरकारी साजो-सामान, रंग-रोगन, चपरासी , जीप से मोहल्‍ले के सौरमंडल में उपग्रहों के बीच ‘ग्रह‘नजर आता था। रिटायरमेंट के बाद उसका प्रकाश भी धुंधला जाता है। दो-चार दीवाली से साफ -सफाई न होने के कारण अलग से सेवानिवृत्‍त मालिक की तस्‍वीर पेश करता है। रिटायरमेंट के बाद के हादसों के झेलने के बाद सारी अफसरी गुल हो जाती है। उसके बाद हाथ में छड़ी लेकर सुबह मार्निंग वाक करने के सिवाय कुछ करने का मन नहीं रह जाता है। पुराने किस्‍से कारनामे सब भूल जाते हैं, सिर्फ भर्ती कैसे हुए, रिटायर कब हो गये ही याद रहता है।


 इस बीच उन्‍होंने कितने कमजोरों को दबाया, लाचारों को परेशान किया, मजदूरों को लूटा, गरीबों को सताया , गुनहगारों को आश्रय दिया, बेगुनाहों को सजा दी, चोरों को छोड़ा, साहूकारों की चौकसी की, ताकतवरों का साथ दिया, ईमानदारों को परेशान किया , बेईमानों को आशीर्वाद दिया, भ्रष्‍टाचार को पनाह दी, भाई-भतीजावाद को बढावा दिया, लालफीताशाही को संरक्षण दिया, चमचागिरी को फलने-फूलने दिया, अधीनस्‍थ को गुलाम समझा, चपरासी को पैरों की जूती, बाबू को कोल्‍हू का बैल, ड्राइवर को घर का नौकर समझा, अफसरशाही की अमर बेल कायम की आदि कुछ भी बिलकुल याद नहीं रहता है। वे याद करते हुए पश्‍चाताप करना भी चाहते है, तब भी उन्‍हें कुछ याद नहीं आता है, क्‍योंकि रिटायरमेंट के बाद उसका प्रायश्‍चित नहीं हो सकता है।

आगे पढ़ें: रचनाकार: उमेश गुप्ता का व्यंग्य : अफसर के रिटायरमेंट का दर्द http://www.rachanakar.org/2009/01/blog-post_4359.html#ixzz2e4mn7x1w
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Thursday, August 29, 2013

नई पीढ़ी के व्यंग्यकार ---- उमेश कुमार गुप्ता की कलमसे

नई पीढ़ी के व्यंग्यकार ----  उमेश कुमार गुप्ता  की   कलमसे

                                                       व्यंग्य लेखन से मेरा उद्देेश्य लोगों का मजाक उड़ाकर उन्हें हसी का पात्र बनाकर सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करना नही है । समाज में कुछ ऐसी बातें व्याप्त है, जो आम आदमी ठगे जाने के बाद भी समझ नहीं पाता है और दिन प्रतिदिन पिसता जाता है । ऐसी बातों को अपने लेखों ओैर व्यंग्यों के माध्यम  से लोगों तक पहुंचाना ही मेरा उद्देश्य रहा है । 

                                               इसके अलावा ऐसे लोगों को भी दर्पण दिखाना रहा है जो छल कपट चोरी ,बेईमानी करने के बाद भी समझते है कि उन्होने कुछ नहीं किया है और उनके बारे में लोगों को कुछ नहीं मालूम है, जबकि समाज में इसके विपरीत उल्टा असर रहता है । 

                                                   हमारा भारतीय समाज दहेज प्रथा, जातिप्रथा, धार्मिकता, अंधविश्वास, गरीबी, बेकारी आदि आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, बुराईयों से ग्रस्त है, जिसमें सबसे ज्यादा प्रभावित, देश का आम आदमी है और आम आदमी को ही अपने लेखों का नायक बनाकर प्रायः व्यंग्य लिखे गये हैं । जिसमें अधिक से अधिक समस्याओं को हल सहित उठाये जाने का प्रयास किया गया हैं।

                                                        आस पास में व्याप्त विषमताओं चेहरे पर चेहरे लगाये, रंग बदलते चेहरे को देखकर उन्हें सरल सीधे शब्दो में बिना लाग लपेट के व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है और व्यंग्य ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा अपने और अपनो पर चोट करके लोगो को समझाया जा सकता है ।

                                                    मुझे व्यंग्य लेखन की प्रेरणा संत कबीर, हरिशंकर, परसाई, चाणक्य, जैसे महान लोगों से मिली है ,जिन्होने अल्प शब्दो में  ही गाकर में सागर भरकर लोगों को सामाजिक विशेषताओं की ओर सोचने को मजबूर  किया है। मेरे द्वारा युवाओं में व्याप्त समस्याओं ,छेड़खानी, प्रेम, फिल्म के प्रति आकर्षण की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया गया है । वहीं प्रदूषण, मंहगाई, इलाज, बीमारी ,गरीबी के कारणो की तरफ भी लोगों का ध्यान खींचा गया है । नारी जाति में व्याप्त समस्याओं पर विचार किया गया है और समाज में व्याप्त दोहरे मापदंड आर्थिक विषमताओं का उल्ल्ेाख किया है।

                                                     बी.एस.सी. एम.ए. (अर्थशास्त्र) में करने के बाद पत्राचार में पत्र कारिता का एक वर्ष का कोर्स और उसके बाद एल.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की और इस बीच कई लेख, वयंग्य,फीचर,निबंध देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए और समस्थाओं द्वारा पुरूष्कृत भी किये गये । उसके बाद वेलेन्टाइन-डे-कानून के रूप में लोगों के मध्य किताब के रूप में आने का पहला प्रयास है

Wednesday, August 7, 2013

बिचैलिये

                                        बिचैलिये

                                                   बिचैलिये जिन्हें हिन्दी में मध्यस्थ , उर्दू में दलाल, अंगे्रजी में आरबिटेªटर कहते हैं, बहुत काम के आदमी रहते हैं जो काम इस दुनिया में हम स्वयं नहीं कर सकते हैं, उनहें यह बड़ी आसानी से कर देते हैं जिस काम के बीच में बिचैलिये आ जाते हैं, उसके निपटने में ज्यादा समय नहीं लगता है। इनके शब्दकोष में नेपोलियन और नेताओं की तरह ‘असंभव‘ शब्द नहीं होता है, इनके लिए सभी काम संभव है। ये कहीं ना कहीं से काई तिकड़म भिड़ाकर लोगों का काम कर देते है।

                                     बिचैलिये के पास हकीम लुकमान की तरह हर ला - इलाज मर्ज का इलाज रहता है, ये आपको सात समुन्दर पार खाड़ी के देशों में नौकरी दिवाल सकते हैं, घर बैठे बी.ए. पास करवा सकते हैं, मैट्रिक की जाली अंक सूची लाकर कालेज में प्रवेश दिलवा सकते हैं, किसी भ्रष्टाचारी से मिलकर आपके नालायक इंटर फेल आवारा बेटे की अच्छी सरकारी नौकरी लगवा सकते हैं, बिचैलिये इस पृथ्वी पर हर वह काम कर सकते हैं, जिसके लिए भगवान को विभिन्न रूपों में इस संसार में बार-बार अवतार लेना पडता था।

                                          बिचैलियों के लिए कोई काम छोटा या बडा नहीं रहता है। ये आपके पुत्र पु़ित्रयों की शादी से लेकर उनके सुकुमार तक का नर्सरी में प्रवेश आसानी से करा सकते हैं, ये छोटी सी खरीद से लेकर देश के सामरिक महत्व के सौदे तक में अपना दखल रखते है, इनकी खोजबीन करना कठिन काम है, ये ऊपर से दिखने में अदृष्यमान, सिर्फ अनुभव करने वाले जीव होते हैं, इनका हमें आभास हो सकता है, परिचय नहीं ।इनकी खोजबीन के लिए राॅ.सी.आई.ए.के.जी.बी.स्काॅटलैंड यार्ड जैसी प्रसिद्ध जासूसी संस्थाएं लगानी पडती हैं । वौफोर्स तोप सौदे को ही देखिए, अभी तक बिचैलिये का पता नहीं चल पाया है और प्रतिभूतिकांड में बीच वाले इतना खा गये हैं कि सही घोटाला राशि का आंकलन नहीं हो पाया है।

                                               बिचैलिये का काम प्रायः सभी लोग करते हैं, डाक्टर , इंजीनियर, आदि सभी इसमें सम्मिलित हैं। छोटा डाक्टर कमीशन पर बडे डाॅक्टर के पास आॅपरेशन केस भेजता है, वकील भी हर मुकदमें में मध्यस्थता करता है, बिचैलिए का काम आदमी ही नहीं बल्कि उसके द्वारा संचालित पत्र-पत्रिकाएं , रेडियो, टेलीविजन आदि सभी जनसंचार के सभी माध्यम भी करते हैं। पत्र-पत्रिकाएं घर बैठे ही आपका काम करती है।, ये आपके लिए वर-वधू, नौकर-नौकरी, घोडा-गाडी, आदि की व्यवस्था जुटाती है, ये बिना किसी परेशानी के हमारे लिए सुन्दर सुशील, गृहकार्य में दक्ष, गौर वर्ण कन्या और चार अंकों की आय वाला सुशिक्षित , अमीर खान की तरह सुन्दर वर दिलवाने में सहायक होते है। बिचैलिये जीवन की तीन मूलभूत आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा, और मकान के लिए बहुत जरूरी हो गये हैं। आज के जमाने में इनकी उपेक्षा करना रावण के दरबार में मेघनाथ की उपेक्षा के समान है। जिस तरह सरकारी दफ्तरों में बिना मेवा चढ़ाये आपका काम नहीं हो सकता है, उसी तरह बिना बिचैलियों के भी कोई काम नहीं हो सकता हैं।

                                       बिचैलिये मुफ्त में काम नहीं करते हैं, मुफ्त में काम करना इनके उसूलों के खिलाफ है, ये जनसेवा में नहीं बल्कि ‘मुफ्त नियरे राखिए‘ में विश्वास रखते हैं। ये हम काम का ‘सत्य मेव जयते‘ वाले देशभक्तों की तरह अग्रिम वसूल कर लेते हैं, इनमें हनुमान की तरह स्वामिभक्ति , राम की तरह पितृभक्ति का अभाव रहता है। अगर हम यह सोचे कि ‘‘थैक्यू सर्विस‘‘ से काम चल जाएगा तो हमारा ऐसा सोचना व्यर्थ है। ‘‘ थैक्यू सर्विस‘‘ का इन पर कोई असर नहीं पडता है। बिचैलियों से मुफ्त में काम कराना आज के जमाने में हनुमानजी की तरह उडकर समुद्र पार करने जैसे असंभव कार्य से भी ब
बिचैलिए जहां लाभदायक हैं, वहीं गुलाब में कांटे की तरह हानिकारक भी है। ये मौका मिलने पर पंचतंत्र की नायिका ‘बंदरिया‘ की तरह दो लोगों की लडाई में उनका हिस्सा हथियाने से नहीं चूकते हैं। इसलिए उनसे काम निकल जाने के बाद लोग उसी तरह पछताते हैं, जिस तरह पांच साल के लिए नेता चुनने के बाद।


                                       बिचैलियों से काम निकलवाने के लिए लोगों को आधुनिक लैलाओं की तरह सावधानी बरतना चाहिए। आधुनिक लैलाएं जो नित्य अपना काम निकलवाने नये-नये मजनुओं को जनम इस सावधानी के साथ देती है कि काम निकल जाये और वह उनके गले में घंटी भी ना बांध पाये अर्थात समाज में हल्ला भी मचने ना पाये और मजनूं शादी की बात सोचे बिना उनके आगे पीछे कुत्ते की तरह मंडराता रहे। यदि यह सावधानी बिचैलिए से काम निकलवाते समय अपनायी जावे तो सुनिश्चित ही चित भी हमारी होगी और पट भी।

कौन कहता है-भूत नहीं होता

               कौन कहता है-भूत नहीं होता

                                      हमारा, महात्मा बुद्ध का, कर्म स्थान और शिक्षा का महान केन्द्र नालंदा विश्वविद्यालय की जन्म स्थली बिहार राज्य देश में एक ऐसा राज्य है जो रोज नये, एक से एक राज, हीरे की खदान की तरह उगल रहा है। पहले आश्चर्य प्रकट हुआ कि जानवर का चारा आदमी खा गये, उसके बाद आश्चर्य हुआ कि जेल में कैदी घर से ज्यादा ऐशो आराम में मोबाइल फोन, वी.सी.आर., टी.वी., ए.सी. के बीच जिंदगी गुजार रहे हैं। फिर पता चला कि वहां पर 21 भूत वेतन ले रहे है।इस खबर को प

                                    भूत बीता हुआ कल है, जो हमेशा सामने उजागर रहता हैं। कुछ लोग हैं, जो कहते हैं कि भूत नहीं होते हैं। वे कल में जी रहे नहीं होते है, बल्कि वर्तमान में मर रहे होते हैं। इसलिए उन्हें भूत की याद नहीं रहती है। यदि वे कुछ कर गये होते तो वर्तमान अच्छा कटता और फिर भविष्य की चिंता नहीं सताती और भूत उन्हें हमेशा याद रहता है।

                                   हम कल क्या होंगे, सोचकर जी नहीं पाते हैं, बल्कि कल हमें क्या करना है सोचकर जीते हैं और वर्तमान में ऐसा जीवन क्यों जी रहे हैं इसे सोचने-समझने हमेशा भूत को याद करते रहते है। काश ऐसा कर देते तो कहां होते ? काश ऐसा नहीं किया होता तो आज यह दिन देखने नहीं मिलता ? इस प्रकार भूत हमेशा साथ रहता है। वह कभी पीछे नहीं छूटता। वर्तमान की परछाई अगर भविष्य है तो उसका अतीत भूत है।

                                काल तीन बताये गये हैं - भूत, भविष्य, वर्तमान लेकिन शाश्वत काल तो एक है उसके बाद न तो भूत बचता है, न भविष्य की चिंता , न वर्तमान की खटपट रहती है।

                            पूरे ‘जीवन कालचक्र‘ में जिसमें ‘काल‘ के बाद भविष्य कभी नहीं रहता है। इसलिए जीते जी भविष्यवाणी करना टे

                                   गांधी मर गये, चरखा, लाठी, सत्य, अहिंसा, स्वावलंबन की शिक्षा दे गये। व्यवसाय के नाम पर लघु, कुटीर उद्योग बता गये। लेकिन किसी को भी इस भूत में भविष्य नहीं दिख रहा है। इसलिए वर्तमान इन बातों से अधूरा पडा है। कोई सत्य, अहिंसा, स्वावलंबन पर नहीं चलना चाहता है, सब मशीनगन, स्टैनगन से बात करते हैं। उधारी कोई नहीं रखता है, सब तुरन्त उधारी चुकाना चाहते हैं। वास्तविक जीवन में भले हम गांधी बने रहते हैं, लेकिन भूत और भविष्य में कोई गांधी नहीं बनना चाहता है।

                                        आज हम कल की बात करते हैं और कल के लिए लोक की धमकी देते हैं। सब स्वर्ग लोक में जी रहे हैं। जो बीत चुका वह पाताल लोक है जो बीतने वाला है वह भविष्य का नरकलोक है। वर्तमान में स्वपन में स्वर्ग में जीने का स्वप्न पूरे कर रहे है।इसलिए भूत के पाताल की याद कर भविष्य के नरक की तस्वीर वर्तमान के स्वप्न में नहीं देखना चाहते है।

                       कर्म, काज, कार्य जो सबका पालनहार है। वह ‘काल‘ की चिंता नहीं करता है। अर्थात् उसे भविष्य का डर नहीं हैं। इसलिए ‘कर्मयोगी‘ वर्तमान में जीते है।भूत से सीखते हैं, कामगारों को कोई भूत भी नहीं सताता है। क्योंकि वह हमेशा कर्म करने के कारण वर्तमान में ही जीते रहते हैं। वर्तमान में जीना ही सही जीवन है, भूत की याद, भविष्य के डर से वर्तमान को भूल जाना कहां उचित है।

भूतकाल में यदि हम बीते अवसर को याद करते हैं तो उनका सही लाभ न उठा पाने के कारण भी पीडा पहंुचती हैं। इसलिए हम उन्हें याद नहीं करना चाहते हैं और उसे पे्रतात्मा के दुःस्वप्न के साथ जोड देते हैं। जो व्यक्ति बीते अवसरों का लाभ उठा लेते हैं, उन्हें भूत याद नहीं आते हैं और वे वर्तमान में जीकर भूत की उनेक्षा करते हैं, उन्हें राक्षसों का भय नहीं सताता हैं, इसलिए वे कहते हैं कि भूत नहीं है।

                                        बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता है। लेकिन जब हम उस समय से कोई सीख नहीं ले पाते है। तो वह समय फिर डरावने स्वप्न की तरह बारबार दिखाई देता है। जब तक उससे सीख नहीं ले लेते हैं वह दिखाई देते जाता है और उसी स्वप्न को हम भूत मानते हैं जिसे कोई भी बात जानने के बाद देखना नहीं चाहता। जब बीता ‘काल‘ दिखता है तो विचार आता है कि ‘कर्म‘ उस पर, उस समय भारी नहीं था, इसलिए उस ‘भूत‘ को ‘वर्तमान‘ पचा नहीं पाया और वह अपच ‘भूत‘ बनकर हमारे गले बार-बार पड रही है। दिल को एठ मरोड रही है।

                                 हमारे नीति के भूत गांधी है। उसी ‘भूत‘ के कारण हम उन्हें याद करते हैं और जिस दिन गांधी वर्तमान में आ जायेंगे, उस दिन से उनका ‘भूत‘ लोगों के सिर से उतर जायेगा। लेकिन ‘गांधी‘ का ‘भूत‘ आसानी से लोगों के सिर पर चता नहीं है।

गांधी मशीनीकरण के विरूद्ध थे। हम आज मशीनों पर जिंदा हैं। आदमी मशीन बन गया है। कुटीर उद्योग केवल इंटिरियर डेकोरेशन की वस्तु रह गये हैं। ऐन्टिंम और यूनिक वस्तुओं में उनकी गिनती है, जो घर के एक कोने की शो-पीस के रूप् मेें शोभा ब

धर्म-निरपेक्षता, साम्प्रदायिकता, तकनीकी शिक्षा के अभाव में बेरोजगारों की भीड है। अन्याय के विरूद्ध अंहिसा ने हिंसा का रूप् ले लिया है। हम पहले अन्याय का विरोध नहीं करते है। और ज बवह बढ कर पाप बन जाता है तब विरोध करते हैं उसके बाद पाप का इलाज अहिंसा से करना संभव नहीं है। फिर कुटिलता के कांटे को कौटिल्य से ही निपटाना पडता है।

हम मकान बनाते हैं, नींव खोदते हैं, उसके ऊपर इमारत खडी कर देते हैं। भूल जाते हैं कि नींव भूत हो जाती है। जो मकान खडा है वह वर्तमान है। वह ‘भूत‘ को भूल नहीं पाता है और जब तक नींव को याद करता है, तब तक खडा रहता है। जैसे ही भूलता है, उसके

वर्तमान ही भूत और भविष्य है। भूत को लेकर वर्तमान में जिये तो भविष्य सुखी, उज्जवल होगा और कभी भूत , भविष्य की चिंता नहीं सतायेगी। जैसे सत्य ही ईश्वर है और सत्य ही संुदर है। उसी प्रकार से वर्तमान ही भूत है, वर्तमान ही भविष्य की छवि है।

                  कर्म का कोई ‘काल‘ नियत नहीं किया गया है। ‘काल करे सो आज कर‘‘, जो भूत में कर्म करने वाले थे, अभी करों और ‘आज करे‘ सो अब अर्थात जो भविष्य में कर्म की सोच रहे हो उसे तुरन्त वर्तमान में करों। यहां पर शब्दों का अर्थ वहीं हैं सिर्फ ‘काल‘ का फर्क है। ‘कल कर‘ सो आज करें में कल भूत, आज वर्तमान है आज करे सो अब में, आज भविष्य है, अब वर्तमान काल है और कर्म अर्थात ‘अब‘ वर्तमान में जी रहे है।

यहां पर हम पहले सोचते हैं, जैसे ही सोचते हैं कर्म का विचार आता हैं । वहीं ‘कर्मकाल‘ है। सोचते ही नहीं किया वह ‘‘ भूत‘‘ हो गया और ‘‘आज‘‘ नहीं कर पाते हैं, इसलिए नहीं होने के कारण ‘भविष्य‘ में चला जाता है। उसके बाद ‘अब‘ बनता है जो ‘वर्तमान‘ है, जिसे नहीं किया तो वह कभी नहीं हो सकता है। क्योंकि ‘पल‘ बीतते ही विचार भूत, भविष्य में बदल जाते है। वे वर्तमान का रूप नहीं ले पाते है।

                                    उपर्युक्त विश्लेषण से यह बात तो स्पष्ट है कि भूत होता है और भूत के आधार पर वर्तमान में कोई जी रहा है तो उसे भूत नहीं कहेंगे। इसलिए यदि मक्कारी बेईमानी, भ्रष्टाचार, अय्यारी के कारण लोग वेतन निकाल रहे हैं तो इसमें आश्चर्य की बात नहीं होना चाहिए । यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र में शामिल है। जिस तरह की यह घटना है, वहां की लीला के हिसाब से यह बहुत छोटी बात है। इनसे दूसरे प्रदेशों की जनता शिक्षा न ले यह उनके बस की बात नहीं है, इसलिए भूत होता है यह मानकार उस घटना को भूल ही जाने दें। क्योंकि वर्तमान और भविष्य को कर्म के प्रभाव से बदला जा सकता है, किन्तु भूत तो शाश्वत है इसलिए भूत, भूत होता है उसे बदला नहीं जा सकता। यह मानकर उस घटना को भूत हो जाने दें।

आंतक का जवाब

                                                           आतंकवाद विरोध 
                                  हम यह सोचते है कि शांति पूर्वक मोमबत्‍ती की एक लौ जलाकर आतंकवाद के हेंड ग्रेनेड, आर.डी.एक्‍स ,एके. 47 रायफल का मुकाबला नहीं किया जा सकता । तो हम गलत हैं । पूरे देश की सड़कों पर हर मूल, वंश ,वर्ण,वर्ग ,मजहब , तबके के लाखों लोगों ने मोमबत्‍ती की छोटी सी लौ जलाकर एकता की ऐसी मिसाइल जलाई है जिसके सामने परमाणु बम की चमक-धमक, दमक भी फीकी पड़ गई है ।

                             हमारा यह सोचना गलत है कि आतंकवाद का विरोध सरकारी वाहन जलाकर होना चाहिए । सरकारी दफ्तरों को आग के हवाले करके होना चाहिए । जन सेवकों के पुतला दहन से विरोध होना चाहिए । हम यह गलत देखना चाहते हैं कि आतंकवाद के विरोध स्‍वरूप उन सुरक्षा कवच की होली जलाई जानी चाहिए थी । जो हमारे सिपाहियों को नहीं बचा पाई । उन हेलमेट की तोड़ -फोड़ होना चाहिए थी जो जंग लगे होने के कारण ऐन वक्‍त पर काम नहीं आये । हमारा यह भी सोचना गलत है कि उन बंदूकों को नष्‍ट करके विरोध होना चाहिए था जो ऐन वक्‍त पर काम न आ सकी, और सुरक्षा बल केवल हाथ मलते रहें ।

                                       हमारा यह भी सोचना गलत है कि विरोध स्‍वरूप उस खुफिया तंत्र को तितर-बितर करना चाहिए था जो समय रहते जानकारी होते हुए भी कठोर कदम नहीं उठा पाया । उन व्‍यक्‍तियों को सरेआम सूली पर चढ़ाकर विरोध होना चाहिए था जो आतंकवादियों से मिले हुए है । उन चौकीदारों को सरे आम पदमुक्‍त करके विरोध होना चाहिए था जिनकी सघन चौकसी में वे सीमा में प्रवेश कर गये । उन सुरक्षा कर्मचारियों को बेनकाब करके विरोध होना चाहिए था जिनके सुरक्षा दस्‍ते में वे सेंघ लगाकर आये थे । उन जयचंदों को मौत के घाट उतारकर विरोध होना चाहिए था, जिनकी सहायता से वे महीनों से भारत में फलफूल रहे थे ।

                                          उन विभीषणों के नरसंहार से आतंकवाद विरोध होना चाहिए था जिन्‍होंने देश के भेद बेचे । उनके सहयोगियों के कफन-दफन से विरोध होना चाहिए था। जिन्‍होंने चंद पैसों के खातिर उन्‍हें मोबाइल सिम, सूचना, नक्‍शे, जानकारी, उपलब्‍ध कराई । उस धरती को नष्‍ट करके विरोध होना चाहिए था । जहां रहकर उन्‍होंने आतंकवाद की शिक्षा, दीक्षा, प्रशिक्षण प्राप्‍त किया था । उन आकाओं की मृत्‍यु से विरोध होना चाहिए था जिनके इशारे पर उन्‍होंने काम किया ।


                                                        यदि हम ऐसा सोचते हैं तो गलत सोचते हैं । हमें ऐसा विरोध करना चाहिए था कि हम भ्रष्‍टाचार की होली जलाये, सीमा पर कड़ी चौकसी रखें, आपस में जाति, धर्म, मजहब, के नाम पर बम की तरह न फटे । जिस तरह देश की जनता ने सड़क पर आम और खास का भेद भाव न रखते हुए विरोध व्‍यक्‍त किया है । वह देश चलाने वालों के लिए एक सीख है कि वह सब करें, लेकिन देश की एकता, अखंडता , अक्षुण्णता के साथ खिलवाड़ न करें । यदि समय रहते उन्‍हें समझ नहीं आती है तो उन्‍हें राजमहलों से सड़क पर आने में ज्‍यादा समय नहीं लगेगा ।


                                                 हमें यह समझना चाहिए कि देश की जनता करोड़ों रूपयों का टैक्‍स, कर, चुंगी, राजस्‍व, लगान, फीस अदा करती है जिसके पीछे स्‍वतंत्रता से जीना, उनके प्राण एवं देह की रक्षा करना ,व्‍यापार, व्‍यवसाय, आवागमन की स्‍वतंत्रता होना ,बोलने और लिखने की छूट होना ,आदि मौलिक बातें शामिल है । यदि हमें संविधान में प्रदत्‍त प्राण और दैहिक स्‍वतंत्रता का मूल अधिकार प्राप्‍त नहीं होता है तो यह हमारी नीतियों की कमी है जिसे हम आतंकवाद का नाम देकर नहीं छुपा सकते हैं ।
                                                      आतंकवाद हमारी लचर नीतियों की उपज है । हम ऐसे लोगों को घर में घुसने देते हैं जो हमारे देश के दुश्‍मन है । जो नहीं चाहते कि कश्‍मीर भारत का अभिन्‍न अंग रहें । जो नहीं चाहते कि भारत के लोग जातिपात, मजहब की दीवारों को तोड़कर एक साथ रहे ,जो धर्म के नाम पर मंदिर मस्‍जिद की आड़ लेकर लड़वाना चाहते हैं । उन लोगों को हम बढ़ावा देते हैं । अपने जहन में उन्‍हें पनाह देते हैं ।


                                 ऐसे कुछ देश द्रोंही देश के दुश्‍मन हमारे देश में भी मौजूद हैं । जिनके पास अपना अस्‍तित्‍व बनाये रखने, लोगों को आपस में लड़वाने के सिवाय अन्‍य कोई तरीका नजर नहीं आता है । यही कारण है कि आज भारत धर्म, भाषा, जाति के नाम पर कई टुकड़ों में बंट चुका है । देश के अंदर उसके कई भाग हो गये हैं । आजादी का तिरंगा लहराने के लिए हमें जंग की तरह देश के अंदर तैयार करनी पड़ती है । कुछ जगह तो आजाद तिरंगा लहर भी नहीं पाता है ।

Tuesday, August 6, 2013

कबीर एक क्रांतिकारी कवि

            कबीर एक क्रांतिकारी कवि
                      संत कबीर एक महान क्रांतिकारी कवि थे। जिन्होंने बिना लाग लपेट के समाज में व्याप्त कुरीतियोंए बुराईयांे को उजागर किया था। उन्होंने समाज में व्याप्त जातिए धर्मए वर्ग आदि के मध्य विद्यमान भेदभाव को बडी सहजता से व्यक्त किया था। 
 
उनकी वाणी बहुत सरलए सुन्दरए आम बोलचाल की भाषा में थी। उन्होने क्षेत्रीय भाषा अपनाकर दैनिक बोलचाल के शब्दो का प्रयोग अपनी वाणी में किया था।
उनके दोहाए साखीए बीजकए उलटए बंसिया आज भी शोध का विषय है। एक पंक्ति में एक ग्रंथ की बात कह देना उनकी विशेषता थी बडी आसानी से उन्होने अंधविश्वासए जातिय भेदभावए छुआछूतए पांखड जैसी सामाजिक बुराईयो को व्यक्त किया था । यही कारण है कि आज कई कवि आकर चले गये परन्तु कबीर अपने स्थान पर अडिग हैं । उनके आसपस दुनिया का कोई कवि नहीं लगता है।
कबीर के दोहो को साखी कहा जाता है । साखी शब्द साक्षी का प्रतीक है । साक्षी का अर्थ है सामने होना । महान कबीर ने अपने जीवन में जो देखा जो सुना जो अनुभव किया उसी को अपनी साखियों में व्यक्त कियाए जिन्हें दोहा भी कहा जाता है । इसी कारण आज साखी हिन्दी साहित्य में ज्ञान के कोष के रूप में जानी जाती है ।
भक्तिकालीन निर्गुण संत परंपरा के प्रमुख कवि कबीर का जन्म काशी में हुआ और निर्वाण मगहर में प्राप्त हुआ । उन्होने कोई प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। आस.पास के अनुभव से ज्ञान प्राप्त किया था। आस.पास की अव्यवस्था शब्दों में व्यक्त कर महानता प्राप्त की थी ।
संत कबीर भक्तिकालीन एक मात्र कवि थे जिन्होने राम.रहीम के नाम पर चल रहे पाखंडए भेद.भावए कर्म.कांड को व्यक्त किया था। उस समय राज सत्ताए प्रभु सत्ता के नाम पर व्याप्त डर के कारण आम आदमी जो कहने से डरता थाए उसे विचारक कबीर ने धूम धडाके से कहा ।
दार्शनिक कबीर का आदर्श मनुष्य धर्मिकए सामाजिक भेदभाव से मुक्त प्राणी था जो पत्थर नहीं पूजता थाए ईश्वर के नाम पर मुर्गे जैसी बांग नहीं देता था। छोटे.बडे सभी उसके लिए बराबर थ्ज्ञे । जो कर्मवान थाए ज्ञान का पुजारी थाए अपने अंदर ईश्वर को खोजता था। उसके नाम की माला नहीं फेरता था बल्कि जुबान से भक्ति करता थाए वह संकीर्णताओ से दूर था।
कबीर का मनुष्य ज्ञान की सहायता से दुर्बलताओ को मुक्त करने वाला प्राणी था जिसने बाहरी आंडबरांे का विरोध कर अपने भीतर झांककर ईश्वर की प्राप्ति की थी ।
कबीर के प्राणी की पहचान कुल से नही बल्कि कर्म से होती थी । यही कारण है कि उनका ईश्वर के सबंध में कहना था कि न मैं देवल मेंए न मै मस्जिद मेंए न काबे.कैलाश मेंए न तो कौने क्रिया कर्म मेंए न ही योग.बैराग मेंए मैं सब श्वांसों की श्वास में ।
कबीर जन भाषा की निकट कवि थे । सरल ढंग से कठिन चिंतन को व्यक्त करने की अद्भूत शक्ति उनमें थी । वे एक शब्द में सम्पूर्ण दर्शन ज्ञान उडेल देते थेए यही कारण हे कि दिगम्बर के गांव में क्या धुबियन का काम ष्ष्कहने वाला कवि केवलए कबीर हो सकता है । 
 
ज्ञान की महिमा का बखान करने वाला कबीर का कहना था कि जैसे तलवार का महत्व होता है मयान का नहीं वैेसे ही साधु के ज्ञान की परख होती हैए उसकी जातिकी परख नहीं होती ।
कबीर हिन्दी साहित्य के पहले व्यंग्यकार है जिन्होंने अपनी वाणी में सामाजिकर्ए आिर्थकए धार्मिक जाति विरोधाभासों को व्यक्त किया है । यही कारण है कि वे आज व्यंग्यकारो के आदर्श है । 
 
महान् कबीर भारत के वे सुकरात हैंए जिन्होंने जहर के प्याले में बैठकर अमृत की वर्षा की ।


Wednesday, July 10, 2013

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Sunday, July 7, 2013

हीरो बने जीरो , हिर्रो इन बनी विषकन्या [ hero became zero heroine became poison girl ]

हीरो बने जीरो , हिर्रो इन बनी विषकन्या
                                                   हमारी फिल्मों में खलनायिकाओं की परम्परा अब एकदम खत्म हो चली है।आज फिल्म जगत में ऐसी कोई भी अभिनेत्री नहीं है, जिसे खलनायिका का दर्जादिया जा सके। पहले हमारी हर फिल्मों में एक खलनायिका रहा करती थी,

                                                      कुलदीप कौर, ललिता पवार,शशिकला, पुतली आदि अनेक अभिनेत्रियों ने फिल्मोंमेंखलनायिकाओं के रूप में काम किया था, परन्तु बिन्दु के बाद ऐसी कोई अभिनेत्रीनहीं उभरी, जिसे खलनायिका कहा जाये।
फिल्मों में खत्म होती खलनायिकाओं की परम्परा का प्रमुख कारण है आजकी हिरोईनें , जो फिल्मों में कुछ भी करने को राजी है। जो काम पहले की हिरोईनेंमधुबाला, मीना कुमारी, वहीदा रहमान ने नहीं किया , वह काम आज की हिरोईनेंसहर्ष कर रही है।

                                                 आज हिरोईनें खलनायिकाओं की तरह कैबरे, डिस्को, देह प्रदर्शनबडी आसानी से कर रही है। उन्हें हाथ में शराब का गिलास लिए मुंह में सिगरेटका धुआं छोडते बडी आसानी से देखा जा सकता है। आज हिरोइनंे वक्त आने परछुरी, पिस्तौल, बंदूक चला रही हैं, डाकू भी बन रही है।हेमामालिनी जैसी अभिनेत्री फिल्म रामकली में डाकू बनी, श्रीदेवी-फिल्म‘डकैत‘ में डाकू बनी, फिल्मी कहानी फूलवती में तो रीता भादुडी फूलन देवी डकैततक बनी थी।

                                    राम तेरी गंगा मैली की हिट हिरोइन मंदाकिनी फिल्मी सिंहासन मेंविषकन्या बनी, जीनत अमान, पूनम ढिल्लौ, डाकू और हसीना फिल्म में डकैत बनीहैं। विश्व सुन्दरी ऐश्वर्या ने फिल्म खाकी में बुरी औरत की भूमिका निभाई है तथाकाजोल, मनीषा ,शिल्पा आदि ने आतंकवादी देशद्रोही आदि बुरी स्त्रियों की भूमिका
निभायी है।


                                                   हमारी फिल्मों में खलनायिका का काम , हिरोईनों के बीच मन-मुटाव पैदाकरना, विलेन के साथ साठं-गांठ रखना, कैबरे आदि से हीरों को कुछ समय केलिए अपनी तरफ आकर्षित करना था। आज यही काम हर फिल्म में प्रतिष्ठित
हिरोईनें कर रही है। खलनायिकाओं की जगह कुछ नृत्यांगनाऐं कलपना अ ̧यर,जोजनिल नीनादास , सिल्क स्मिता आदि ने ले ली है, जिनका काम फिल्मों में एकआध नृत्य करना रह गया है।खलनायिकाओं की परम्परा पुतली, शहजादी, माया
बैनर्जी कुलदीप कौर, शशिकला और अंत में बिन्दु के बाद आकर खत्म हो गई है।

                                             हम बिन्दु को फिल्म जगत की आखरी सफल खलनायिका मान सकते हैं।फिल्मों से खलनायिकाओं की खत्म होती परम्परा का कारण आज की देहप्रदर्शन करती, विषकन्या बनती हिरोइनें हैं, किन्तु इसके साथ और भी कई कारणहैं। जैसे हमारे यहां अब अधिकतर लडाई-झगडे वाली फिल्में बन रहीं हैं, जिसमें
खलनायक की तरफ ही ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इसी तरह आज ‘‘एंग्री यंगमैन‘‘ इमेज वाली नायक प्रधान फिल्मों का जमाना है, जिसमें पूरी फिल्म नायक केचारों तरफ घूमती है। फिल्म की हिरोइन तक हीरो पर आश्रित रहती हैं। ऐसीस्थिति में खलनायिका को कोई पूछने वाला नहीं है।


                                           हमरी फिल्मों में जिस तरह आज खलनायिकाओं की परम्परा खत्म हो चुकीहै, उसी तरह से अब धीरे-धीरे कामेडियन भी गायब होते चले जा रहे है। एक
जमाना था, जब हमारी फिल्मों में दो-दो, तीन-तीन कामेडियन हुआ करते थे, परआज एक-आध कामेडियन भी बडी मुश्किल से दिखाई पडता है।फिल्मों में कामेडियनों के गायब होते चले जाने का कारण है आज के हीरोव खलनायिकाओं द्वारा कामेडी का किया जाना। आज का बडे से बडा हीरो अपनीउल-जलूल हरकतों, उछलकूद से दर्शकों को बडे आराम से हंसा रहा है। अमिताथबच्चन, धमेन्द्र, मिथुन, अभिषेक, विवेक, सलमान, आमीर, सैफ खान आदि प्रतिष्ठित
हीरो के समान कामेडियन भी नहीं हंसा सकते हैं आज फिल्म के हीरो ने जहांकामेडियनों की लुटिया डुबोई है, वहीं रही-सही कसर खलनायकों ने भी पूरी करदी है। खलनायक फिल्मों में बुरे काम तो कर ही रहे है। साथ में कामेडी भी खूबकर रहे हैं या यों कहिए की कामेडी के साथ-साथ खलनायकी कर रहे है। अमजदखान, कादर खान, शक्ति कपूर जैसे नामी खलनायक अपनी उटपटांग हरकतों ,
ऊल-जलूल, दोहरे संवादों द्वारा इतनी अच्छी कामेडी कर रहे हैं कि कामेडियनों कीकोई कमी नहीं अखरती है। खलनायकों द्वारा कामेडी की गई फिल्में हिम्मतवाला,स्वर्ग से सुंदर, मवाली आदि सुपर हिट हुई है।
                                         हमारी हर फिल्मों में हीरों व खलनायकों द्वारा कामेडी कराये जाने कीपरम्परा सी चल गई है। यही कारण है कि अब फिल्मों से कामेडियन गायब होतेचले जा रहे है। मुझे नहीं लगता कि जॉनीवाकर, मेहमूद, केष्टो मुखर्जी, असरानी,देवेन्द्र वर्मा ने जिस परम्परा को आगे बढाया था, उसे बीरबल, राकेश बेदी, राजेश
पुरी अशोक सर्राफ जैसे नए कामेडियन आगे बढा पायेंगे। केवल जानी लीवर,राजपाल यादव से ही कुछ उम्मीद की जा सकती है।


examination - fever

                    examination - fever
                          हम लोगां को जैसे जवानी में और जाते-जाते बुढापे में ‘प्रेम-रोग‘ सताताहै। उसी तरह साल भर न पढने वालों को परीक्षा के समय ‘परीक्षा रोग‘ सताता है।इम्तिहान सिर पर आते ही लोग परीक्षा की तैयारी में जुट जाते हैं। ‘‘ कौचिंगक्लासों‘ में संख्या बढ जाती है। यहां वहां से दो तिहाई बहुमत प्राप्त करने की होडमें सांसद, विधायक, पार्षद, खींचने की तरह नोट्स प्राप्त करने की भाग-दौड शुरू
हो जाती है।

                                इस समय जिन छात्रों ने साल भर में पढाई, क्रिकेट खिलाडियों की तरह,गंभीर होकर न खेलने की तरह की हो वे भी परीक्षा के समय ‘सिरियस‘ नजर आतेहैं। जैसे वर्ल्ड कप क्रिकेट आते ही कोच, बोर्ड, खिलाडी, दर्शक सभी सजग होजाते है। इस समय सब मस्ती बन्द कर दी जाती है, पार्टियां स्थगित कर दी जाती
है। गोल मारकर फिल्मे देखना बंद हो जाती है। स्कूल-कॉलेज के मैदान क्रिकेटग्राउन्ड नजर नहीं आते है। कैम्पस के चारों तरफ छायी मौज-मस्ती का माहौलसचिन, धोनी के शून्य पर आऊट हो जाने की तरह शान्त नजर आता है।
                     इस समय क्लास बंक करने वाले छात्र, प्राक्सी हाजरी वाले छुपे रूस्तमछात्र भी गंभीरता के साथ बीस प्रश्नोत्तर लिये पढते नजर आते हैं। एक्जामिनेशन टैंशन‘ से ग्रस्त वेफिक्र रहे छात्र चिन्तित नजर आते हैं। चारों तरफचुनाव की तरह तैयारी की चर्चा रहती है। हैलो-हैलो का बिल बढ जाता हैं घरवाले खुश हो जाते हैं कि फोन पर पढाई हो रही है।

                         पॉंच साल में एक बार आने वाले चुनाव में जिस तरह मतदाताओं कीएकाएक पूछ बढ जाती है, उसी तरह परीक्षा के समय शिक्षकों की भी मांग, कीमत,
प्रतिष्ठित, डिमान्ड, वैल्यू, पूछताक्ष बढ जाती है। गाली देने वाले छात्र वोट ग्रहिताकी तरह पैर छूकर गुरूजन को सिर पर बैठाते हैं। जमकर आवभगत की जाती है।
                           वोट देने वालों की तरह सिगरेअ, शराब, कम्बल, तो नहीं बांटे जाते, लेकिन ‘मनी‘जरूर ऑफर की जाती है। मार्गदर्शन के नाम पर ‘चुनिन्दा प्रश्न‘ प्राप्त करने परअच्छी खासी रकम पेपर लीक करवाने पर खर्च की जाती है।
        देश में ऐसी कोईकुर्सी नहीं जिसमें छेद न हो यह बात प्रमाणित की जाती हैं इस समय छात्रों द्वारापांच साल में एक बार जन समस्याओं की तरह ‘टॉपिक‘ समझे जाते है। शिक्षकों के
प्रति सम्मान की भावना बढ जाती है। वे गोविन्द से बडे नजर आने लगते हैं।
                              परीक्षा के समय भगवान के मंदिरों में भी भीड बढ जाती है।  भगवान को भीग्यारह, इक्वायन, एक सौ एक का प्रसाद चढाने का लालच देकर पास करने कीमिन्नत् की जाती है। सोमवार को शंकर जी, मंगलवार को हनुमान जी,गुरूवार कोगणेश जी, शुक्रवार को दुर्गा जी के दरबार में हाजिरी लगाई जाती है। किसी भी
भगवान को रूष्ट कर फेल होने का चान्स नहीं लिया जाता हैं। यह बात अलग हैकि उनमें से अधिकांश छात्र बाद में भगवान पर फेल होने का दोष मढकर नास्तिक
हो जाते हैं।

                    इस समय छात्र जो पाठ्यक्रम साल भर में पूर्ण नहीं किया उसे एकदिन, एक रात में पूरा करने का हनुमानी प्रयास करते हैं उनके इस भागीरथी प्रयाससे रात की नींद, दिन का चैन पर्स का वजन उड जाता है। पैदा करने वालेमां-बाप से भी न डरने वाले छात्र परीक्षा के भय से भयभीत नजर आते है। साथियोंसे बिछुडने का गम, फेल होने पर लडकियों के बीच होने वाले संभावित बेइज्जतीके भय से घबराए हुए पढते नजर आते है।

भगवान का व्यवसायीकरण

   भगवान का व्यवसायीकरण
                             हमारे देश में बडे मंदिरों में भगवान का व्यवसायीकरण कर दिया गया है।मंदिरांे में श्रद्धालुओं की बढती भीड, दर्शनार्थियों की अपार संख्या ने प्रबंधकों कोविशेष दर्शन का उपाय सुझाया है। जल्दी दर्शन चाहिए एक सौ एक रूपये कीटिकट कटाओ, नहीं तो मीलों लंबी लाइन में घंटों खडे रहो। ऐसी स्थिति मेंव्यवस्थापकों, ने अमीर और गरीब के बीच ‘विशेष दर्शन‘ की रेखा खींच दी है।                                    
                                                    अबगरीब व्यक्ति आसानी से देव दर्शन नहीं कर सकता है। जबकि अमीर आदमी एकसौ, एक रूपये की रसीद कटवाकर तुरंत देव दर्शन कर सकता है।हमारा देश नेताओं के भरोसे तो चल नहीं रहा है। भगवान भरोसे चल रहाहै। ऐसी स्थिति में भगवान, ईश्वर, ईश, अज के दरबार में दर्शनार्थियों , श्रद्धालुओं,भक्तजनों की भीड उमडती है, और एक दिन मंे हजारों की संख्या में लोग दर्शनकरने जाते है। 

                          श्रद्धालुओं की बढती हुई भीड को देख कर मंदिर संचालकांे ने ‘क्यूसिस्टम‘ पकडा है। भक्तजनों को लोहे के सीखचों में घेरकर लाईन में आने कोबाध्य किया जाता है।छह से आठ घंटे तक भक्तगणांे को परमात्मा के दर्शन में लग जाते हैं।उसके बाद भी मंदिर में अंदरपरमेश्वर के दर्शन व्यवस्थापक ढंग से करने नहीं देतेहैं। जैसे ही मंदिर में घुसत हैं चलो-चलो, हो गया, हटो-हटो, बढो-बढो की डांटके साथ जबरन आगे खिसका दिया जाता है। 

                                                 श्रद्धा-भक्ति से भरा सार्थक
दीन-दुनिया से परेशान भक्त, आस की प्यास में सूखता श्रद्धालु कुछ नहीं बोल
पाता है। ईश्वर के नाम पर खून का घूट पीकर रह जाता है।
भक्तजन को आदमी के दरबार और भगवान के दरबार में कुछ अन्तर नजर
नहीं आता हैं। बाहर भी नेतृत्वकर्ता के दर्शन दुर्लभ है। अंदर पालनहार को देखने
चक्षु तरस जाते हैं। एक बार भगवान के दरबार में ठोकर खाकर कई भक्तगण घर
में ही मूर्ति -फोटो लगाकर पूजा अर्चना करना उचित समझते हैं।

                        भगवान खुद वी.आई.पी. है। लेकिन उसके दरबार में भी बत्ती और आठ -दस सुरक्षा कर्मचारियों को देखते हुए याचकों को वी.आई.पी. बना दिया जाता है।क्या उनको देखकर भगवान भी डर जाता है ? और उसके अनुयायी, देखरेख कर्ताविशेष दर्शन की व्यवस्था करते हैं। हजारों लोग इस दर्शन को देखकर गाली देेतेहैं। सात पुश्तों को कोसते हैं, परन्तु ‘व्यवस्था‘ पर कोई फर्क नहीं पडता है।

                          देश के रईस, कुबेर, धर्माधिकारी गण, राजराज, जनेश्वर, नरेश को भगवानके विशेष दर्शन की छूट दी जाती है। एक हजार एक, पांच सौ एक, एक सौ एककी टिकट कटाओ, भीड़ से छुटकारा पाओ, घंटो लाईन लगने से बचो , विशेषटिकट कटाकर पलभर में भगवान के दर्शन करों। ऐसा कुछ दिन और चला तोयहां भी आरक्षण की मांग उठेगी और पांच धनपतियांे के बाद एक गरीबी रेखा केनीचे वाले को निशुल्क विशेष दर्शन की विशेष सुविधा उपलब्ध करानी पडेगी।
                               इस
बात पर सभी सर्वहारा वर्ग के खेलनहारांे का ध्यान नहीं गया हैं । संसद के एक
मिनट की कीमत पच्चीस हजार रूपये है। इस तरफ नेताओं का ध्यान भी नहीं गयाहै, नहीं तो लाखों रूपये खर्च करके इस बिंदु पर बहस भी हो सकती है।
विशेष दर्शन के साथ-साथ मंदिरांे में ही प्रसाद , भस्म, आरती, भोग आदि
सभी वस्तुएं विशेष दरों पर मिलती है। इक्कीस रूपये से लेकर एक हजार एक ,
तक की थाली आपको सजी-सजाई मिल जायेगी। उसके नीचे कोई प्रसाद की
थाली नहीं मिलती है। आपको अपनी जेब देखकर थाली बनवानी होगी। उससे
पूजन के बाद प्रसाद के रूप में आधा सामान वापिस मिलेगा बाकि भगवान को
खिला दिया जाता है।

                                लोग तो कहते हैं कि पीछे के रास्ते से नारियल, चिरौंजी,
अगरबत्ती आदि सामान पुनः विक्रय के लिए चला जाता है। कुछ तो सच्चाई है,
तभी तो आम आदमी भगवान पर आरोप लगाने की हिम्मत कर रहा है।
आप यदि, धनपति, पैसे वाले हैं तो आप पहले आकर विशेष अवसर पर
विशेष आरती कर सकते हैं। आपकी पोशाक विशेष अवसर पर भगवान को पहनाईजा सकती है। बस आप पैसा खर्च करते जाईये। भगवान, के व्यवस्थापकों को इसबात से कोई मतलब नहीं है कि वह धन, सफेद हो जाता है। यही लक्ष्मी की मायाहै लेकिन उस भक्त की बात पर विश्वास नहीं हो रहा है जिसने कहा कि भगवानके दरबार में सब एक हैं सबको भगवान एक नजर से देखता है। यदि ऐसा है तोफिर मंदिरों में अमीर गरीब की खाई क्यों खोदी जा रही है ? सबको एक ही लाइनमें लाकर दर्शन के लिए क्यों नहीं बाध्य किया जा रहा है।

                               ऐसी जगह पर होटल वाले भी खूब लूटपाट करते हैं। हजारों के कमरेबताते हैं, और सब्जी भाजी की तरह मोल-भाव करने पर सैंकडों में कमरा दे देतेहैं। सस्ती होने के कारण धर्मशालाओं में जगह आसानी से मिलती है। देश कीअधिकांश गरीब जनता को घर के बाहर धर्मशाला में ही शरण मिलती है।
                        टैक्सी वाले भी भाडा 1⁄4 ऊन का दून 1⁄2 बताते हैं। जिसको देखो वह भगवानके नाम पर लूट करता मिलता है। इस प्रकार भगवान से जुडी हर वस्तु का ऐसीजगह पर व्यवसायीकरण कर दिया गया है।

‘गंगा‘ THE AUTO BIOGRAPHY OF GANGA


 THE AUTO BIOGRAPHY OF GANGA 
                            मैं आपकी पतित पावनी ‘गंगा‘ बहुत दुखी हंू। मेरा अमृतमय पानी प्रदूषितहोकर विषाक्त हो गया है, वह पीने लायक भी नहीं रह गया है। मुझमें जोऔषधिकारक गुण था, वह धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। मैं बीमारियों का घरबन गयी हॅंू। मेरे पानी के सेवन से अनके लोगों को हानि पहुंच सकती है।
                                इन सबकारणों से मैं बहुत दुखी हूं। मैं इस मृत्यु लोक में भगीरथी की कठिन तपस्या केकारण इस मरूभूमि को शुद्ध करने आयी थी, लेकिन यहां के निवासियों को शुद्धकरते -करते मैं खुद की अशुद्ध हो गयी हॅ। आज स्थिति यह हो गयी है कि मुझे
शुद्ध करने हेतु एक राष्टंीय स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। एक ‘गंगाविकास प्राधिकरण‘ की स्थापना की गयी है, जिसका उद्देश्य गंगा को प्रदूषण सेमुक्त करना हैं इस कार्य के लिए करोडों रूपये खर्च किये जा रहे है।
                                         मेरी इसदुर्दशा के लिए बहुत से लोग दोषी हैं, जिनमें मेरे भक्त भी बडी संख्या में शामिलहै।मेरा उदय हिमालय के पास गंगोत्री से हुआ है। बहुत दिनों से हिमालय केपाास वनों की अंधाधुंध कटाई की जाती रही है जिसके कारण पहाडी क्षेत्रों में बाढ
आती है उस बाढ से पेडों का मलबा बहकर नदी में जम जाता है। इस प्रकार जिसजगह से प्रारंभ होकर मैं सारे देश में बहती हूं,वहीं से मुझमें गंदगी समा जाती हैं

                                                मैं‘गंगोत्री‘ से ही प्रदूषण युक्त हो जाती हूं। इसके बाद मैं नीलधारा में नहरों के रूप्में बहती हूं। नहर के रूप में बहने के कारण मुझमें गंदगी छानने की प्राकृतिकक्षमता खत्म हो जाती है। गंदगी मेरी तलहटी में जमा हो जाती हैं इस तरह से पूरे
देश में अपनी में गंदगी समाये बहने लगती हूं।


                                       मैं अनेक नगरों में बहती हंू। मेरे तट पर लगभग 114 शहर बसे हुए हैंजिनमें 48 प्रथम श्रेणी के तथा 66 द्वितीय श्रेणी के नगर है। इन सब नगरों कीगंदगी नालियों का दूषित जल मुझमें बडे व छोटे नालों द्वारा गिराया जाता है ।

                                           आपको मेरी दुर्दशा का अन्दाजा इसी से हो जायेगा कि मुझमें गिरने वालेनदी-नालों की संख्या 16 हजार हो गयी है। जिसमें गंगोत्री से वाराणसी तक ही1611 गंदगी ने मुझे प्रदूषित कर दिया है।मेरे तट पर बसा हुआ कानपुर एक बहुत बडा औद्योगिक नगर है, जो अपने‘चमडा उद्योग के लिए जग प्रसिद्ध है। मुझमें लगभग 60 बडे चर्म उद्योग कारखानोंका कचरा आकर मिलता है।

                                                इस कचरे में क्रोमियम धातुकीअधिकता रहती है,जिसके कारण मेरा पानी दुर्गन्धयुक्त हो जाता है। उसमें कैंसर तथा चर्मरोग केजीवाणु पनपने लगते है। मेरे पानी को तो कानपुर के चमडा उद्योग ने एकदमविषक्त कर दिया है। आज मेरा यह हाल हो गया है कि जहां में पहले स्वास्थ्यलाभ पहुंचाती थी, आज वही हानिकारक सिद्ध हो रही हूं।

                                                 पूरे देश में मेरे किनारेबसे हुए लगभग पांच हजार छोटे-बडे उद्योग अपना रासायनिक पदार्थों युक्त कचरा
मुझमें बहाते हैं इन उद्योगों में मात्र 1966 के पास प्रदूषण नियंत्रण के संयत्र हैं,बाकी सब उद्योग मुझे प्रदषित कर रहे है।

                                        अपने पापों को धोने के लिए लाखों लोग रोज मुझमें स्नान करते हैं । मुझेभगवान की तरह पूजते है। इसके साथ ही मेरी किनारे पर मल-मूत्र का त्याग करमुझे दूषित भी करते हैं, और तो और मुझमें सारे शहर का मलयुक्त पानी भी बहादेते है। अकेले बाबा शिव की नगरी बनारस में मुझमें 20 करोड गैलन मलयुक्त
पानी गिराया जाता है।


                                               मेरे तट पर मनुष्य की लाशें जलाई जाती हैं प्रतिवर्ष तीस हजार लाशें मेरेकिनारे पर जलाई जाती हैं या बहा दी जाती हैं पहले मुझमें घडियाल, कछुए,मगरमच्छ, मछलियां आदि सारी गन्दगियां चाट जाते थें लेकिन जब से इनकासफाया कर दिया गया है, मैं अकेली रह गयी हूं मुझमें फैंके मुर्दे या जानवर बुरी
तरह सड जाते हैं और गिद्ध व कुत्ते आदि मेरे चारों ओर गन्दगी फैलाते रहतेहै।

                                                     मछुआरे मुझसे मछली लेकर पेट पालते हैं मगर वे भी अपनी सारी गन्दगी मंझमेंही डालकर मुझे प्रदूषित कर रहे है। धोबी भी मुझमें अपना सारा मैंल डाल जाते है।
मुझमें 70 हजार तीर्थयात्री प्रतिदिन अकेले बनारस में डुबकी लगाकर न जानेक्या-क्या बीमारियां छोड जाते है। मैं पाप धोने वाली गंगा अब गंदगी धोने वालीगंगा बन गयी हूं।

                                   सोर देश के लोगों ने मुझे प्रदूषित कर रखा है। सबसे ज्यादा 33प्रतिशत मुझे उत्तरप्रदेश के लोगों ने दूषित कर रखा है। इसके बाद पश्चिम बंगालने 27 प्रतिशत, बिहार ने 20 प्रतिशत प्रदूषित किया है।


                                         मेरी व्यथा सुनकर आज आप ही नहीं बल्कि सरकार भी द्रवित है जो मुझेप्रदूषण मुक्त करने के लिये जोर-शोर से अभियान चला रही है। आप यह सोच रहेहोंगे कि पवित्रता की देवी, पाप हरने वाली, भारत की आत्मा ‘गंगा‘ खुद क्योंप्रदषित हो गयी , तो इसका सीधा सा कारण है कि लोग मुझमें पाप धोने की
बजाये अपनी गन्दगी धोने में लग गये हैं ।

                                  आज मैं कितनी दुखी हूं, इस बात काअन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है। कि जो लोग ‘गंगा तेरा पानी अमृत‘कहकर सम्मान देते थे, वहीं आप मुझे ‘राम तेरी गंगा मैली‘ कहकर मेरा मजाकउडा रहे है।


होली holi

                                     होली holi
                          होली राग, रूप, रस , रंग, उत्सव, उमंग, उल्लास, उन्माद मौज-मस्ती,हंसी-खुशी का अनुपम , अद्भद, अविस्मरणीय त्यौहार है। इसमें रक्षा बंधन काप्रेम-त्याग, दीपावली की चमक-दमक, अपव्यय , दशहरा की अच्छाई पर बुराई कीजीत,शक्ति पूजा आदि सभी त्यौहारों का समिश्रण है। इसलिए इसे ‘फलों का राजा‘आम की तरह ‘त्यौहारों का राजा‘ कहा जा सकता है।

                       होली के रंग में भंग तो है ही और भंग की तरंग मंे बुरा न मानो होली,अपना इन्द्रधनुषी रंग दिखाती है। पूरा दिन मधु प्रेमी करोडपति के गाने पर ‘खईकेपान बनारस वाला‘ की धुन पर नाचते है। और उसके पिता की मधुशाला कागुणगान करते है। केक न काटने वालों का भी ‘‘ हैप्पी न्यू ईयर‘‘ इसी त्यौहार केबाद प्रारंभ होने वाले मास से प्रारंभ होता है । होली का त्यौहार व्यक्तियांे में नईखुशियां, नया उल्लास ,नया उत्साह नई उमंग , नई चेतना , नई स्फूर्ति भरता है।
                        होली का त्यौहार प्रेम का त्यौहार हैं। इस दिन सब लोग द्वेष भूलकर मिलते है।और चुटकी भर गुलाल-अबीर में गंगा में पाप धोने की तरह सब पिछली कटुताभुला देते हैं। दसों दिशाएं, चौदह लोक , नवरस और सतरंग में डूब जाते हैं।


                          इस त्यौहार में प्रेम की मार है, प्रेम की भरमार है। प्रेम के कई रंगपिचकारियों से फूटते है। ढोलक की थाप से कई प्रेमरस गूंजते हैं। ‘ मिस्टर
वेलेन्टाइन‘ ‘होली‘ के दिन भारत नहीं आये थे, नहीं तो वे भी विदेशों में ‘वेलेन्टाइनडे‘ की जगह ‘होली‘ की वकालत करते और सारी दुनिया होली के रंग में डूबीनजर आती ।
                                                 लेकिन हमारे देशी, विदेशी देशभक्त होली के त्यौहार को वेलेन्टाइनडे की नजर से नहीं देख पा रहे हैं, इसलिए उनहें इसमें प्रेमरस नजर नहीं आ रहाहै। जबकि इतिहास गवाह है कि कितने ही प्रेम दीवाने होली के आस में बैठकर ,मिलन की याद में विरह के गीत गाकर अपने दिन काटा करते थे।

                                                                होली में रस रंगों की छूट रहती है कि वे किसी भी रंग में अपनी राधा कोरंग सकते हैं। बस उनमें लठ की मार सहने की क्षमता बृज की गोपियों की तरहहोनी चाहिए। हरी झंडी मिलने पर वे अधर को अधर में न रखकर सही जगह होलीके रंग में रंग सकते हैं। होली का दिन ‘रसिकों‘ का दिन रहता है। इस दिन वेअपने साल भर की हसरत पूरी करते हैं। जिनअवयवों को वे दूर से साल के तीनसौ पैसठ दिन ताका करते थे, उन्हें छूकर असली होने की दिलासा अपने दिल कोदिलवाते हैं।

                     इस दिन देहरंग, रूपरंग, रसरंग, अंगरस, खजुराहों रस, लोलिता रस,वात्सायन रस , लेडिज चर्टलीज लवर रस , हनी रस का रसास्वादन रसिक करतेहैं।

                     हमारे देश मेंखुशी और गम दोनोंमदिरा, वीरा, मद्य केमें हारने का गम हैसमाज में व्याप्त दोहरे मापदंड की तरह शराब का सेवनमें समान रूप् से किया जाता है। होली के दिन मदमस्त कोउपयोग-उपभोग की छूट रहती है। क्यों न रहे ? जब चुनावतो हाला ? जीतने का अविश्वास है तो हाला ? जब हर
समस्या का हल ‘हाला‘ है तो ऐसे में होली बिना ‘हाला पिये‘ के कैसे रह सकती
है।


              हुडदंगों को बिना शराब के होली की कल्पना कोरी लगती है। जैसे नेता
बिना देश अधूरा लगता है। इसलिए इस दिन चोरी-छिपे मदमस्त होने की छूट
रहती है। हालांकि बाजार में इसकी कानूनी रूप से बिक्री बंद रहती है, लेकिन पीछेके गेट से जो हमेशा सामने के गेट से बडा होता है। शराब खुलेआम मिलती है
और माघ में कुंभ स्नान की तरह इस दिन अमृताप्रेमी इसमें स्नान करते हैं। इसलिएसडक पर कोई हाला प्रेमी के मुंह में कोई चौपाया होली खेलते मिल जाए तो इसेहोली के रंग में भूल जाना चाहिए।


                 होली को पोली कर कई लोग अपने अनदेखे अंगों को याद करते हैं औरउसके आकर-प्रकार-व्यवहार से लोगों को परिचित कराते हैं। इसदिन ‘सत्य मेवजयते‘ वालों की तरह खुलेआम, निरंतर, सतत, अबाध रूप से गाली बकने की छूटरहती है। इस दिन आप किसी को भी गाली बक सकते हैं, अपने पैदा करने वालेमां-बाप को पैदा करने पर कोस सकते हैं, चम्मच को चम्मचा कह सकते हैं औरपागल को पागल बता सकते हैं।

                                                               जिनको डर, दबाव, इज्जत के कराण तीन सौ पैसठ दिन गालियां नहीं देपाते थे, उन्हें भी खुलकर गाली बक सकते हो। जिसको चाहकर भी गाली नहीं देपाते हो, उन्हें भी उनके न निभाए गये वादे, आश्वासनों, वचन, प्रतिज्ञा, भंग के लिए,रिश्तेदारों , सहित याद कर सकते हो। होली में सब चलता है। जब पांच सालमें एक बार शक्ल भी नहीं दिखाई दी तो एक दिन की गाली कैसे सुनाई देजायेगी। सुन भी ले तो होली में सब माफ हैं।


                                                           होली में गाली बकने के लिए नशे में रहना बहुत जरूरी है। हर दिन तोहोश में रहते हैं, इसलिए होश की बात नहीं कर पाते हैं। लेकिन इस दिन बेहोंशहोकर होश की बात छाती ठोंककर दिलेरी से कर सकते हैं। कोई बुरा मानकर भीबुरा नहीं कर सकता है।

                                            सत्य का कोई उत्तर , जवाब, प्रतिउत्तर , अर्द्धसत्य नहीं हैं सॉच को कभीऑच भी नहीं है। थोडी तकलीफ जरूर है तो तपाकर व्यक्ति को सोेने के समानकंचन कर देती है, लेकिन हम उसी दौर में टूट जाते हैं। पता नहीं कैसे सृजन कादुख सृजनकर्ता झेलता है।


                                                                   हमारे देश में लाखों भक्त प्रहलाद हैं, करोडांे हिरणकश्यप, होलिका हैऔर एक भी नरसिंह अवतार नहीं है। इस कारण देश के लाखों प्रहलाद , गरीबी,बेकारी, भुखमरी, अशिक्षा, अनीति की आग में जलकर भस्म हो रहे हैं। होलिका कीजादुई, करिश्माई, वरदानी चादरका कोई पता नहीं है। कई भक्त प्रहलाद तोस्कूल की शक्ल भी नहीं देख पाते हैं और अशिक्षा अपराध के अंधकार में फंसकरबाल मजदूर , बाल अपराधी बनकर अंधेरी कोठरियों में अपना जीवन काट देते हैं।


                                                                      हम देश में धर्म पर अधर्म की जीत का त्यौहार होली प्रति वर्ष मानते हैं,लेकिन सही होली तो हम तब मनायेंगे जब अपने नौनिहालों को अच्छी शिक्षा देंगे,नीति का पाठ पढायेंगे, उन्हें गरीबी, भुखमरी में भी शान से जीना सिखायेंगे। आजउन्हें धर्म की रक्षक होलिका की उडी हुई जादुई चादर ढूंढकर उडाने की जरूरतहैं, तभी होली सार्थक होगी और भक्त प्रहलाद व नरसिंह अवतार की मेहनत सफलहो पायेगी।

advance things आधुनकता का पवित्रीकरण

                          आधुनकता का पवित्रीकरण

                                               हमारे देश में सदा से रहा है कि जब भी कोई नई वस्तु आती है तो उसकाधार्मिक विरोध जरूर किया जाता है। प्रारंभ में गैस चूल्हे, टेलीविजन, कम्प्यूटर,केबिल टी.वी. आदि वैज्ञानिक साधनों का विरोध भारतीय सभ्यता-संस्कृति के कथित
ठेकेदारों द्वारा किया गया था।


                                        लेकिन आज जमाना बदल गया है। अब आधुनिकतम साधनों का धार्मिकरणहो गया है। मोबाइल फोन साधु-सन्तों की कमर में जनेऊ की तरह टंगे रहते हैं।उनके कमन्डल के अंदर लेपटॉप रखा होता है। टेलीविजन बिना उनके कार्यक्रमनहीं होते हैं। कम्प्यूटर पर प्रवचन, गीत, भजन के कार्यक्रम तैयार किये जाते है।इन्टरनेट पर वेबसाइट बनाई जाती है।


                                                       वे देश की सबसे आधुनिकतम गाडी में चलते हैं, जिसमें उनके खाने सेपखाने तक की सुविधाएं रहती हैं वे झोपडीनुमा ए.सी. रूम में रूकते हैं। उनकेलाखों-करोडों डालर के आश्रम, ध्यान केन्द्र, अध्यात्म केन्द्र, धार्मिक केन्द्र हैं जोआधुनिकतम साधनों से भरे पडे हैं। उनके लाखांे के आडियो-वीडियो कैसेट्स,प्रचार सामग्री बिकती है।


                                                     अब साधु-महाराजों का विदेशी तकनीक से कोई विरोध नहीं है। उनके द्वाराआधुनिकतम साधनों का पवित्रीकरण कर दिया गया है। अब साधु-संतों कामोबाइल, लेपटॉप, वेबसाइट, टी.वी. चैनल के बिना काम नहीं चल सकता है।

                                             उनकेद्वारा खुद को भगवान के रूप् में स्थापित कर आत्मा की शांति, मोक्ष प्राप्ति, पार कागंगाई शुद्धीकरण, ओम शांति ओम, योग से निरोग आदि आधुनिकतम कार्यक्रमचलाए जा रहे हैं, जिन्हें भक्तजनों को वेबसाइट, टेलीविजन, वीडियो कैसेट्स केमाध्यम से भी दिखाया जाता है।


                                                     देश में गंगा के शुद्धीकरण का कार्यक्रम चल रहा है और ये लोग गंगा सेलोगों को शुद्ध करना चाह रहे हैं। घर बैठे महाकुंभ, प्रवचन आदि का लाभवेबसाइट से उठाया जा सकता है। डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट काम 1008 महाराज.................को इन्टरनेट पर खोजकर ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।


                                      आधुनिकतम युग में सिर्फ साधु सन्तों की पोशाक ही पुरानी है। उन्होंनेअपनी भाषा भी बदल जी है। प्रवचन के पीछे अंग्रेजी में ज्ञान गंगा बाहाई जाती है,लेकिन धार्मिक साधनों का पवित्रीकरण करने के बाद भी वहीं पुराने, रूढिवादी,कट्टरपंथी, दकियानुसी अंधविश्वास बढाने वाले विचार जब आधुनिकतम साधनों द्वारा दिये जाते हैं तो लगता है कि विचारों का भी पवित्रीकरण होना चाहिए।


                                                           समाज की आवश्यकतानुसार धार्मिक विचारों का प्रचार-प्रसार प्रवाह होनाचाहिए, क्योंकि धर्म ही वह शक्कर है जो आदमी के गले जल्दी उतरती है। धर्म हीवह तीर है जो आदमी के दिमाग मंे जल्दी निशाना बनाता है। धर्म ही वह बूटी हैजो आदमी को जल्दी चैतन्य करती हैं धर्म ही वह पाठ है, जिसे आदमी जल्दीपढता है। धर्म ही वह अफीम है जो आदमी का जहदी नशा उतारती है।

गरीब-गरीब-गरीब कहा है

                   गरीब-गरीब-गरीब कहा  है
,                                                        गरीबी वह स्थिति है जब लोग अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति नहींकर पाते हैं। भारत में इसे लाईबायॅंड द्वारा दी गई ‘गरीबी की रेखा‘ से जाना जाताहै। इसके अनुसार यदि 2300 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन से जो भी व्यक्ति कमउपयोग करते हैं, वह गरीबी की रेखा के नीचे रहते हैं।

                                                             भारतीय योजना आयोग नेग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति के लिए 2400 कैलोरी व शहरी क्षेत्र 2100 कैलोरी केआधार पर ‘गरीबी रेखा‘ को परिभाषित किया है। इसी आधार पर गांवों में 51प्रतिशत तथा शहरों में 40 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापनकर रही हैं। भारत में गरीबी के कारण जनसंख्या वृद्धि दर, बेरोजगारी, असमानता
अर्द्धविकास आदि को माना गया है।

                                                        जहां लोग गरीबी का आर्थिक पक्ष ही देखते हैवे मात्र इतना जानते हैं कि लोगों की मजदूरी कम है, महंगाई के कारण उनकागुजारा नहीं हो पाता है। उनकी न्यूनतम आवश्यकताओं भोजन, पीने का पानी ,मकान आदि पर्याप्त नहीं है, शिक्षा, चिकित्सा, नौकरी की आवश्कताएं अपर्याप्त हैकिन्तु वे गरीबी का दूसरा पक्ष नहीं देखते हैं जो कि हमारी दूषित सामाजिकमान्यताओं, धार्मिक अंधविश्वासों भाग्यवाद, नशाखोरी , दहेज प्रथा आदि से जुडाहुआ है।

                                                              हम जानते हैं कि देश में लोगों की मजदूरी कम है, उस पर उन्हें जनसंख्यावृद्धि के कारण परिवार के अधिक सदस्यों का पालन पोषण करना पडा है। इसकेअलावा उसे अनेक धार्मिक अंधविश्वासों का सामना करना पडता हैं। उसे हर माहपडने वाले धार्मिक त्यौहारों पर व्यय करना पडता है। उसके अलावा कभी उसेमुंडन पर और कभी नामकरण पर खर्च करना पडता है।

                                                                       विभिन्न त्यौहारों पर भेंड,
बकरी, मुर्गियां आदि की बलि चढाना आदि ऐसे अनेक धार्मिक कार्य हैं, जिन पर
अनावश्यक रूप से व्यय करना पडता है। वह समझता है कि जितना धार्मिक कार्योमें व्यय करेंगे उतनी ही बरकत होगी, किन्तु वह यह नहीं जानता है कि सदियों सेपीढियां इन धार्मिक कार्यो पर व्यय करती चली आ रही है, किनतु उनकी स्थितिज्यों की त्यों है और इस तरह वह स्वयं भी अपनी गरीबी को बढावा देता रहा है।गरीबी की आय तो सीमित होती है, किन्तु उनके व्यय उससे अधिक रहतेहैं। 

                                          अधिकतर लोगांे को देखा गया है कि वे नशाखोरी करते हैं, भांॅग , गांजा, शराबका नियमित सेवन करते हैं। चाहे उनके घर में चूल्हा जले या न जले। प्रायः देखागया है कि दो से दस -बीस रूपये तक ये लोग शराब आदि पर व्यय कर देते है।इसके लिए उनकी मजदूरी पर्याप्त नहीं होती है, वे कर्ज आदि लेने से भी नहींचूकते है। इस तरह वे पूरे माह की तनख्वाह नशाखोरी आदि में व्यय कर देते हैं,और ऊपर से कर्ज में डूबे रहते हैं, फिर सरकार व समाज को अपनी गरीबी के
लिए कौसते है।

                                                                         सरकार जब गरीबों की उन्नति के लिए उन्हें धंधे , रिक्शे, ठेले आदि केलिए ऋण देती है वह कुछ दिनों तो ठीक से काम करते हैं फिर प्राप्त राशि कोअनुत्पादक कार्यों में व्यय कर देते हैं , प्राप्त राशि को अपनी लडकी की शादी मेंदहेज में लगाते हैं, नहीं तो जुए शराब आदि में खर्च कर देंगे। अन्यथा अपने लिएजेवर, कपडे आदि अनुत्पादक वस्तुएं खरीद लेंगे और इस तरह प्राप्त राशि काअपव्यय कर देंगे, उनकी गरीबी ज्यों कि त्यों बनी रहती है और वह कर्ज में डूबजाते हैं।


                                                  इसलिए सरकार को उन्हें नगद राशि न देकर कुछ उद्योग संबंधीउपकरण देना चाहिए व उन पर कडा नियंत्रण रखना चाहिए। इस तरह स्पष्ट हैकि उनकी दूषित मनोवृत्ति गरीबी बढाने में सहायक हैं। जब कभी भी सरकार,समाज सेवी संस्था आदि उनमें सुधार लाना चाहती है तो उनकी दूषित मानसिकताबाधा पहंुचाती है।स्पष्ट है कि गरीबी वर्ग जितना धार्मिक सामाजिक कार्यो में अपव्यय करताहै। वह नशाखोरी में जितना पैसा पानी की तरह बहाता है, उतना कोई राज पत्रितअधिकारी भी इन पर इतना खर्च नहीं करता है अर्थात् गरीबी के कारण उनकेधार्मिक अंधविश्वास दूषित मनोवृत्ति , नशाखोरी की आदतें हैं, जिन पर उनकानियंत्रण नहीं है ओर वे दोष समाज व सरकार को देते हैं।

                                                            वैसे यह माननाआवश्यक है कि देश में गरीबी के कारण जनसंख्या वृद्धि, बेकारी, अशिक्षा, कृषि परनिर्भरता महंगाई आदि हैं, किन्तु ये आर्थिक कारण ऐसे हैं, जिन पर कुछ नियंत्रणकिया जा सकता है व सरकार कर भी रही है। किनतु गरीबी के जो दूसरे कारणहै, जिनका मनुष्य से प्रत्यक्ष संबंध है, उन पर उसका नियंत्रण नहीं है।


                                                                    वह सिर सेलेकर पांव तक धार्मिक अंध विश्वासों, भाग्यवाद, नशाखोरी , दूषित मनोवृत्ति,सामाजिक कुरीतियों आदि में डूबा हुआ है और गरीबी का जामा स्वयं ही मजबूतीसे ओढे हुए हैं, अतः सरकार या समाज जब तक इन अनुछुए पहलुओं पर ध्याननहीं देगी, कितना भी कुछ प्रयतन कर लें इस देश से गरीबी नहीं हटेगी।